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Showing posts with the label देवी देवता

माँ नैना देवी

पौराणिक कथा के अनुसार दक्ष प्रजापति की पुत्री उमा का विवाह शिव से हुआ था। शिव को दक्ष प्रजापति पसन्द नहीं करते थे, परन्तु वह देवताओं के आग्रह को टाल नहीं सकते थे, इसलिए उन्होंने अपनी पुत्री का विवाह न चाहते हुए भी शिव के साथ कर दिया था। एक बार दक्ष प्रजापति ने सभी देवताओं को अपने यहाँ यज्ञ में बुलाया, परन्तु अपने दामाद शिव और बेटी उमा को निमन्त्रण तक नहीं दिया। उमा हठ कर इस यज्ञ में पहुँची। जब उसने हरिद्वार स्थित कनरवन में अपने पिता के यज्ञ में सभी देवताओं का सम्मान और अपने पति और अपना निरादर होते हुए देखा तो वह अत्यन्त दु:खी हो गयी। यज्ञ के हवनकुण्ड में यह कहते हुए कूद पड़ी कि 'मैं अगले जन्म में भी शिव को ही अपना पति बनाऊँगी। आपने मेरा और मेरे पति का जो निरादर किया इसके प्रतिफल - स्वरुप यज्ञ के हवन - कुण्ड में स्वयं जलकर आपके यज्ञ को असफल करती हूँ।' जब शिव को यह ज्ञात हुआ कि उमा सती हो गयी, तो उनके क्रोध का पारावार न रहा। उन्होंने अपने गणों के द्वारा दक्ष प्रजापति के यज्ञ को नष्ट - भ्रष्ट कर डाला। सभी देवी - देवता शिव के इस रौद्र - रुप को देखकर सोच में पड़ गए कि शिव प्रलय न क...

माँ नंदा देवी

नंदा देवी  समूचे  गढ़वाल मंडल  और  कुमाऊं मंडल  और हिमालय के अन्य भागों में जन सामान्य की लोकप्रिय देवी हैं। नंदा की उपासना प्राचीन काल से ही किये जाने के प्रमाण धार्मिक ग्रंथों, उपनिषद और पुराणों में मिलते हैं। रुप मंडन में पार्वती को गौरी के छ: रुपों में एक बताया गया है। भगवती की ६ अंगभूता देवियों में नंदा भी एक है। नंदा को नवदुर्गाओं में से भी एक बताया गया है। भविष्य पुराण में जिन दुर्गाओं का उल्लेख है उनमें महालक्ष्मी, नंदा, क्षेमकरी, शिवदूती, महाटूँडा, भ्रामरी, चंद्रमंडला, रेवती और हरसिद्धी हैं। शिवपुराण में वर्णित नंदा तीर्थ वास्तव में कूर्माचल ही है। शक्ति के रुप में नंदा ही सारे हिमालय में पूजित हैं। नंदा के इस शक्ति रुप की पूजा गढ़वाल में करुली, कसोली, नरोना, हिंडोली, तल्ली दसोली, सिमली, तल्ली धूरी, नौटी, चांदपुर, गैड़लोहवा आदि स्थानों में होती है। गढ़वाल में राज जात यात्रा का आयोजन भी नंदा के सम्मान में होता है। कुमाऊँ में अल्मोड़ा, रणचूला, डंगोली, बदियाकोट, सोराग, कर्मी, पोथिंग, चिल्ठा, सरमूल आदि में नंदा के मंदिर हैं। अनेक स्थानों पर नंदा के सम...

माँ धारी देवी

इतिहास बद्रीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर श्रीनगर से करीब 15 किलोमीटर की दूरी पर कलियासौड़ में अलकनन्दा नदी के किनारे सिद्धपीठ माँ धारी देवी का मंदिर स्थित है । माँ धारी देवी प्राचीन काल से उत्तराखण्ड की रक्षा करती है, सभी तीर्थ स्थानों की रक्षा करती है । माँ धारी देवी मंदिर का इतिहास बहुत पुराना है । वर्ष 1807 से इसके यहां होने का साक्ष्य मौजूद है । पुजारियों और स्थानीय लोगों का मानना है कि मंदिर इससे भी पुराना है । 1807 से पहले के साक्ष्य गंगा में आई बाढ़ में नष्ट हो गए हैं । 1803 से 1814 तक गोरखा सेनापतियों द्वारा मंदिर को किए गए दान अभी भी मौजूद है । बताया जाता है कि ज्योतिलिंग की स्थापना  के लिए जोशीमठ जाते समय आदि शंकराचार्य ने श्रीनगर में रात्रि विश्राम किया था । इस दौरान अचानक उनकी तबीयत बिगड़ने पर उन्होंने धारी माँ की आराधना की थी, जिससे वे ठीक हो गए थे । तभी उन्होंने धारी माँ की स्तुति की थी । इस मंदिर में पूजा अर्चना धारी गांव के पंडित कराते हैं । यहां के तीन पंडित भाई (परिवार) चार -चार महीने पूजा कराते हैं । पुजारी का कहना है कि मां की जो इच्छा हो उसे पूरा किया जाए ...

गोलू देवता

इतिहास आप, हम और हम जैसे कई और लोग हैं जिनको अल्मोडा के निकट स्थित गोलू देवता   के मंदिर मे समय व्यतीत करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है. हमारे पहाड़ मे इस मंदिर और गोलू देवता के लिए काफ़ी आस्था है. इस कामना पूर्ति मंदिर मे आकर सिर्फ़ पहाड़ी लोगों को ही नही अपितु देश-विदेश के लोगों को उनका मनचाहा वरदान मिला है, और शायद यही वजह है की इसकी प्रसिद्धि रोज़ बढ़ती ही जा रही है। आप और हम जानते ही है की गोलू देवता को न्याय का देवता कहा जाता है. पर क्या आप जानते हैं की ऐसा क्यों है ? आज हम आप सभी के लिए गोलू देवता की यही दिलचस्प कहानी लेके आए हैं। कहा जाता है की कत्युरि वंश के राजा झल राय की सात रानियाँ थी। सातों रानियों मे से किसी की भी संतान नही थी। राजा इस बात से काफ़ी परेशान रहा करते थे. एक दिन वे जंगल मे शिकार करने के लिए गये हुए थे जहाँ उनकी मुलाक़ात रानी कलिंका से हुई(रानी कलिंका को देवी का एक अंश माना जाता है)। राजा झल राय, रानी को देखकर मंत्रमुग्ध हो गये और उन्होने उनसे शादी कर ली। कुछ समय बाद रानी गर्भवती हो गयीं. यह देख सातों रानियों को ईर्ष्या होने लगी. सभी रानियों ने दाई म...

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